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अन्तरधार्मिक परिसम्वाद सम्बन्धी

परमधर्मपीठीय विभाग

 

हिंदू और ईसाई: “असीसी की भावना” में एक साथ मिलकर

शांति के रास्तों का निर्माण करें

 

दीपावली सन्देश 2026

 

वाटिकन सिटी

प्रिय मित्रो,

8 नवंबर को मनाये जा रहे दीपावली महापर्व के अवसर पर अंतरधार्मिक परिसंवाद सम्बन्धी परमधर्मपीठीय विभाग आपको अपनी हार्दिक और प्रार्थनापूर्ण शुभकामनाएँ अर्पित करता है। सभी भलाई के स्रोत, ईश्वर आपको, आपके परिवारों, प्रियजनों और समुदायों को भरपूर आनंद, शांति और समृद्धि की आशिष प्रदान करें!

चालीस वर्ष पहले, 27 अक्टूबर 1986 को, संत जॉन पॉल द्वितीय के निमंत्रण पर विश्व के विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि शांति हेतु प्रार्थना करने के लिये असीसी में एकत्र हुए थे। असीसी के संत फ्रांसिस, जिन्हें “शांति का व्यक्ति” (दे. पोप जॉन पॉल द्वितीय, ख्रीस्तीय कलीसियाओं एवं कलीसियाई समुदायों तथा विश्व के धर्मों के प्रतिनिधियों को संबोधन, 27 अक्टूबर 1986) कहा गया था,  उनका जन्म स्थान और समाधि-स्थल असीसी एक ऐतिहासिक मिलन स्थल बना, जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग इस विश्वास के साथ प्रार्थना करने के लिए एकत्र हुए थे कि धर्म और अंतरधार्मिक एकजुटता वैश्विक संकटों से निपटने तथा शांति को बढ़ावा देने में योगदान दे सकते हैं। संत जॉन पॉल द्वितीय ने इसे “असीसी की भावना” (दे. विश्व के धर्मों के नेताओं को संबोधन, 26 अक्टूबर 1986) का नाम दिया, जिसने, पिछले कई वर्षों से, विश्व में शांति हेतु अनगिनत पहलों को प्रेरित किया है।

संप्रति मानवता के समक्ष प्रस्तुत अनेक चुनौतियों, विशेषकर युद्धों, संघर्षों और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म के उपयोग से उत्पन्न होने वाली समस्याओं को देखते हुए, 1986 के असीसी सम्मिलन का स्मरणोत्सव हमें इस बात पर चिन्तन का अवसर प्रदान करता है कि कैसे हम, हिंदू और ईसाई, एकसाथ मिलकर, असीसी की भावना से प्रेरणा लेकर, शांति के रास्तों का निर्माण कर सकते हैं।

एक महत्वपूर्ण रास्ता वह है जिसमें हर कोई साझा आध्यात्मिक प्रतिबद्धता के साथ अपनी-अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार और एक दूसरे की परंपरा का सम्मान करते हुए, शांति के लिए प्रार्थना करने हेतु एकजुट हो जाये। वस्तुतः, सच्ची प्रार्थना मतभेदों को दूर करती है तथा दिल, दिमाग और जीवन को निरस्त्र कर (दे. पोप लियो XIV, 59वें विश्व शांति दिवस के लिए संदेश, 1 जनवरी 2026), हमें करुणा और शांति के पुरुषों और स्त्रियों में परिणत करती है।

दूसरा रास्ता है सभी को ओमनेस फ्रात्रेस, यानी “सभी भाई और बहनें” माननेवाले संत फ्रांसिस (दे. पोप फ्रांसिस, 47वें विश्व शांति दिवस के लिए संदेश, 1 जनवरी 2014) द्वारा प्रस्तुत उदाहरण के अनुरूप सार्वभौमिक भ्रातृत्व की भावना को पोषित करना। भ्रातृत्व भाव हमें दूसरों में ईश्वर के मुखमण्डल को पहचानने और उनके साथ, विशेषकर निर्धनों एवं दुर्बलों के साथ, एकजुटता से खड़े होने हेतु सक्षम बनाता है। जितनी  भ्रातृत्व की भावना हमारे बीच पनपेगी उतनी ही शान्ति हमारे विश्व में जड़ें पकडेंगी।

सबसे बढ़कर, अंतरधार्मिक संवाद असीसी की भावना का प्राण है क्योंकि इसमें सार्वभौमिक शांति को आगे बढ़ाने की गहन क्षमता है। ऐसा सम्वाद आज "अत्यंत आवश्यक" (दे. पोप बेनेडिक्ट XVI, मुस्लिम बहुल देशों के राजदूतों और इटली में मुस्लिम समुदायों के प्रतिनिधियों को संबोधन, 25 सितंबर 2006) है। जैसा कि पोप लियो XIV हमें याद दिलाते हैं, यह "एक निर्णायक भूमिका निभाता है क्योंकि महान आध्यात्मिक मार्गों के केंद्र में शांति का संदेश निहित है" (विश्वपत्र मान्ञिफिका ह्यूमानितास, 223)।

असीसी की भावना मूल रूप से शांति के प्रति एक प्रतिबद्धता है। असीसी सम्मिलन ने विविध धार्मिक परंपराओं के लोगों को एकजुट कर विश्व को यह दिखा दिया कि प्रामाणिक धर्म अपने स्वभाव से ही शांति को बढ़ावा देते हैं और हर तरह की हिंसा को नकारते हैं, क्योंकि हिंसा “धर्म के बिल्कुल विपरीत है और उसके विनाश में योगदान करती है” (दे. पोप बेनेडिक्ट XVI, विश्व में शांति और न्याय हेतु चिन्तन, सम्वाद और प्रार्थना दिवस  पर प्रभाषण, 27 अक्टूबर 2011)।

अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं में जड़ीभूत विश्वासी होने तथा साझा मूल्यों और शांति के लिए समान चिंता रखने वाले व्यक्तियों के रूप में आइए हम - हिंदू और ईसाई - असीसी सम्मिलन की चालीसवीं वर्षगाँठ से नई प्रेरणा लें। शांति के लिए प्रार्थना करते हुए, अपने दैनिक जीवन में भ्रातृत्व की भावना को जीते हुए और अंतरधार्मिक संवाद में सक्रिय रूप से शामिल होते हुए, अन्य धर्मों के लोगों और सभी शुभचिन्तकों के साथ मिलकर विश्व में शांति के लिए कार्य करने हेतु हम अपने जीवन में असीसी की भावना को और अधिक आत्मसात करें।

 

आप सभी को दीपावली की मंगलकामनाएँ!        

 

 

  

      कार्डिनल जॉर्ज जैकब कूवकाड

                          प्रीफेक्ट      

 

                                              मोन्सिन्ज्ञोर इंदुनिल कोडिथुवाक्कु जनकरत्ने कंकनमलगे

                                                               सचिव